“परिवर्तन”

मन छलता हर पल, आशाएं जलती, दिखावे की इस आंधी में,  मैं कहाँ खड़ा हूँ ये तय करना अब भारी है, आंधी में जो खोया है वे कुछ पल थे, अबोध बचपन, अनूठा योवन, और अनगिनत यादें,  अपने अस्तित्व का मूल्य चुकाना अब भारी है,  आरंभ हुए थे कल्पना से,  यर्थात ने हाथ पकड़े है, … Continue reading “परिवर्तन”

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“अवशेष’

​कटे जंगल, मिटे फूल, गिरे पत्ते, उडी धुल, सूखा जल, जीवन तल, विस्तृत वन, छोड पीपल, उड़े पखेरू, तुषार गगन, दिशा विहीन, दशा दीन, आशा अनन्त, भय दिगंत, आश्रय कहाँ? प्रश्न ज्वलंत, भू थमी, थमा चक्र, लगा आघात, गिरा स्तर गिरे तुम, अब शेष, कुछ न रहा।

“सती”

​महायज्ञ रचा गया, पर्वत पुत्रो की धरती पर, गूंज रहे थे सप्तऋषियों के शब्द, अम्बर तक,  आहुतियों पर, धधक रही थी ज्वाला अपमानित, आयुध अधम और कुटिल कर्मों की, रक्त रुदन रंग रंजीत था,   पृथ्वी का पर व्यथित छोर ओर, अश्रु बहते प्रलाप के, सती हुई सुनंदा दक्ष दामिनी, करती थी सम्मानित, नीलकंठ उत्तम … Continue reading “सती”

।  चौपाई  ।।

​1 लोक परलोक ज्ञानी गुनी आतुर। परोपकार तज निजि गुन चातुर।। भूलोक में रहते हुए भी लोग स्वर्ग की कल्पना कर लालायित रहते है, परोपकार को छोड़,  स्वार्थी गुणों के कारण स्वयं को चतुर समझना इस कलयुग में मानव की भूल  है। 2 योग महादेव मुरख कहाँ जानहिं। जिमि मृग कस्तूरी ढूंढत वन माहिं।। महादेव … Continue reading ।  चौपाई  ।।

“मनमीत”

​तुम मेरी हो मैं तेरा हूँ तुम धरती मैं सवेरा हूँ, दमक रही हो कंचन सी तुम, मैं प्रेम प्रकाश सुनहरा हूँ, अधर कमल कहीं ठहर गए थे, प्रीत कथन को कहते कहते, मौन मोह के संध्या समय पर, तुम तड़पी मैं तड़पा हूँ, बीत गया था मास मधु का, तुम संग मिलन प्रतीक्षा में, … Continue reading “मनमीत”

“रावण”

​जलाया जाता हूँ, पर क्यों मरता नहीं, मैं रावण, लौटूंगा अगले वर्ष भी, क्योंकि की, तुम राम नहीं हो सकते, अंतिम बाण नहीं हो सकते, जो जीत गया हो स्वयं को, अहम् को, नही रहा वह धर्म धनुष भी, और नही रहे उसे धारण करने वाले, मैं मरता नहीं हूँ, क्योंकि की, तुम मर्यादित होना … Continue reading “रावण”

“प्रलय”

​जब शहर विस्तृत होंगे विचार संकीर्ण और गरिमा विलुप्त, आनुवंशिकता गुणों पर हावी होगी, तब मानव पशु होगा, उस दिन, संतुलन बिखर जायेगा, आरम्भ होगा प्रलय का, कोलाहल काल फिर न थमेगा, विषाद विष प्रकृति का, शीत नीला वमन होगा, सुन पढ़ जाएँगी नसें, तुम स्पर्श करोगे, मंद होती हृदय गति, आघात होगा संवेदना पर, … Continue reading “प्रलय”

“आस्था”

​वर्तमान, आरंभ या अकाल अंत, प्रमाण या रहस्य, मानव सभ्यता का, आस्था ज्ञान में है या ज्ञानी में? आराध्य का अर्थ भूला मन, अर्थ का अनर्थ करते दृष्टिहीन जन, आस्था तो आधार थी, जीवन मूल्यों का सार थी, व्यवहार थी, अब वह व्यापार है, आडम्बर युक्त साम्राज्य, सत्य का निषेध, धर्म का बोध नहीं, आस्था … Continue reading “आस्था”

“मैं पथिक हूँ-४

​चाल समय की नाप रहा मैं, स्वास् अदत्त परिकलित करता, कठोर जीवन दारुण आघात, रौंध पथ पर आगे बढ़ता, अपने बस स्वप्न अनोखे, यथार्थ पर हावी धोखे, खोज रहा मैं जीवन कुंजी, घाव आभ्यंतरिक लिए सतरंगी, लोक का उलझा ताना बाना, विवशता का रूप पुराना, पग पर भेद गया वह, कितनी ही बार, शूल क्षणों … Continue reading “मैं पथिक हूँ-४

“तर्पण”: स्मरण स्वराज के वीरों का

​मुक्ति यज्ञ में आहुति बन, कितने ही वीर बलिदान हुए, स्वर स्वराज का गरजा जब, द्रोही यमलोक प्रस्थान हुए, वीरों की भरत वसुंधरा ने जब, आक्रांता रक्त से श्रृंगार किया, देख उग्र रूप मातृभूमि का, जागृत चेतन जन उद्धार हुआ, गूंज रही थी चारों दिशाएं, जय जननी उदघोष से, जय तिलक होता था वीरो का, … Continue reading “तर्पण”: स्मरण स्वराज के वीरों का

“मातृभूमि उत्तराखंड”

​जीवन सृजन तरंगिणी अविरल, मंजुल हिमवंत संस्कृति गंगाजल, ललित वसुंधरा उज्वल माटी पर, जन मन जल होता ध्वनि करतल, पुलकित पुष्प भ्रमर गुंजित गीत, पवन पियूष बनी मधुर संगीत, पर्वत पर हरित शस्य श्यामला, शिखरों के लालित्य पखेरू दल, नर-नारी संग उपत्यका में, नृत्य जीवन करते भावविहल, रचित ग्रंथों की सूक्त श्रृंखला, देव धरणी और … Continue reading “मातृभूमि उत्तराखंड”