“परिवर्तन”

मन छलता हर पल, आशाएं जलती, दिखावे की इस आंधी में,  मैं कहाँ खड़ा हूँ ये तय करना अब भारी है, आंधी में जो खोया है वे कुछ पल थे, अबोध बचपन, अनूठा योवन, और अनगिनत यादें,  अपने अस्तित्व का मूल्य चुकाना अब भारी है,  आरंभ हुए थे कल्पना से,  यर्थात ने हाथ पकड़े है, … Continue reading “परिवर्तन”

“वर्ण”

​जातिवाद मानव सभ्यता पर कलंक के समान है। आधुनिक समाज में मानव असंवेदनशील होकर दुसरो को नीचा दिखाने में प्रयास रत है। वैदिक काल की व्यवस्था मानवों के गुण, रूचि और स्वाभाव को केंद्र में रख कर सामाजिक कार्यों को विभक्त करती थी, ताकि मानव समाज प्रगति कर सके। समाज के कुछ संकीर्ण मानसिकता के … Continue reading “वर्ण”

“प्रार्थना”

​अंतर्मन की वाणी बन, व्यक्त अव्यक्त रूप लिए, देह हृदय से फूट रही हो, उपास्य को सार्थक कर, चहुँ दिशा तुम गूंज रही हो, ऊर्जा विशिष्ट अनंत अगोचर, प्रश्नो का बन तुम उत्तर, अनुराग बन अन्तःकरण में अभिव्यक्ति श्रद्धा सी महक रही हो, दुःख परिसीमा भंजन हो, मार्ग सभी अवरुद्ध हो जाते है, वंदन कर … Continue reading “प्रार्थना”

“मैं पथिक हूँ” भाग-3

क्षण भर समय की डोरी खीँचे, गति अपनी मैं मंथर करता, बीत रहा जो देख रहा हूँ, क्रिया पर प्रतिक्रिया के अभास लिए, कर्म अपने मैं तोल रहा हूँ, पाया जो वो नियति है, जो निर्धारित करती यात्रा मेरी, अभिलाषी मन से, नियम जीवन के जोड़ रहा मैं, चुन लेता हूँ, नूतन दिशा अपनी, आतुर … Continue reading “मैं पथिक हूँ” भाग-3

“नमामि गंगे”

​सतोपंथ गौमुख धारा अविरल, भगीरथ तप का पावन फल, तजकर भाव द्वेष के, मन अपना तू गंगा कर ले, अवतरित हो तुम ब्रह्नलोक से, महाकाल केश सी बिखर गयी, जागृत जल के दर्शन कर, मन अपना तू गंगा कर ले, बांध रही है घर नगर और घाटी पुण्य जल से सिंचित माटी, पीकर शीतल पुण्य … Continue reading “नमामि गंगे”

“बचपन”

​होली के गीले रंगों सा बचपन, मन पर सुख चुका, रंग हल्का था, तो क्या हुआ, वो स्मृति बन आज भी, अंतस को महका जाता है, बंद आँखों पर रंग कुछ, हरे नारंगी नीले चमकीले, चित्र बना जाते है, तितली सी खुशियों का, यहाँ वहां उड़ती, जो हाथ न आई, चित्र में दिखता एक, बेहता … Continue reading “बचपन”

“राक्षस”

अभ्र नाश, परिवृत करता, भूतल देह सिंधु बृहत्काय, मन भीतर की ज्वाला कपटी,  उत्प्रेरित करती, मंथर गति से, लोभ मुग्ध हो, वीभत्स पशु प्रवृति, निन्द्य होता चेतन फिर, क्षुधा क्रूरता सीमा लाँघ, नोच रहा है, मांस सदृश मर्यादा को मानव भूल दया को जान, भाव शून्य, भय का स्रोत, रक्त दृष्टि से घूर रहा, छीन … Continue reading “राक्षस”

“जन्मभूमि”

​घाटी पुष्प की, थी कभी जन्मभूमि मेरी तुम्हारी, एकाकी खोयी है स्वयं में, विचार करती है, क्यों??? उन्नति के ताप से, पिघलकर गाँव अब, दौड़ चुके मैदान की ओर, वीथिका वंशहीन हो, तर्पण को तरसती, बंजर खेत मोन अब, जो थे साक्षी तारूण्य के, दे चुके विदाई पक्षियों को, होती अंकुरित आँगन में, नीरवता जो … Continue reading “जन्मभूमि”

“वत्सला”

​मृदा वात्सल्य देवभूमि ले, जल जान्हवी अभिमंत्रित डाल, ब्रह्मा पिता ने सृजनित की, काया अद्भुत हृदय विशाल, अतृप्त अभिलाषा संग लिए, खोज अस्तिव में आतुर वह, समय धार संग निभा रही, भूमिका अतुल्य कितनी वह, छलि जाती वो नित्य ही, सहती बाण अग्नि अपमान, निर्बल नहीं वह शक्ति है, टाल रही प्रलय को जान, भाव … Continue reading “वत्सला”

“सत्य”

​स्याह अभिसंधि सिंधु गहराई में, मन शुक्ति लिए मोती सत्य का, अव्यक्त उज्जवल आभा युक्त, अंतःकरण में वह स्वेत रत्न सा, निर्देशित हो लोभ लाभ से, मिथ्या मार्ग पर चले जाते है, भीतर को ढक शिष्ट आवरण से, यथार्थ मुख सभी छिपाते है, आंकलन बिन किये स्वयं का, निर्णय अन्य पर किये हुए, भाव शून्य … Continue reading “सत्य”

“धर्म”

​बोध क्षमता का जब हो जाये, सर्वोत्तम परिवर्तन तुम्हें मिल पाये, नीति नियम पुण्य पालन कर, धर्म श्रेष्ठ ज्ञाता कहलाये, जीवित जो वो हिंसक है, प्राणी क्षुधा का सेवक है, परजन शांत क्षुधा जो कर पाये, जन सेवा यज्ञ बन जाये, साधन स्वयं का अनुसरण कर, धर्मभाव सहानुभूति जागृत कर, मत्स्य न्याय से उठ ऊपर … Continue reading “धर्म”